सती प्रथा: हिंदू धर्म की सच्चाई या मिथक ?

 

सती प्रथा - यह शब्द सुनते ही आज के समाज में एक निश्चित छवि उभर आती है:



एक स्त्री, आग, और उस पर की जाने वाली क्रूरता… और फिर बिना प्रमाण के इसका पूरा दोष हिंदू धर्म या सनातन परंपरा पर डाल दिया जाता है। लेकिन क्या इतिहास और शास्त्र भी यही कहते हैं?या फिर हमने सदियों से किसी अधूरे, तोड़े-मरोड़े गए नैरेटिव को ही “सत्य” मान लिया है? यह प्रश्न केवल इतिहास का नहीं है, यह न्याय, विवेक और बौद्धिक कसरत का प्रश्न है…क्योंकि सती प्रथा को अक्सर ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे मानो यह हिंदू धर्म की अनिवार्य, शास्त्रीय और धार्मिक व्यवस्था रही हो, और सनातन नारी विरोधी रहा हो… लेकिन इसके विपरीत जब हम वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों और स्मृतियों का निष्पक्ष अध्ययन करते हैं, तो एक चौंकाने वाला सत्य सामने आता है कि - 

सती प्रथा का कहीं भी अनिवार्य धार्मिक विधान के रूप में उल्लेख नहीं मिलता… 

और एक बात कि, स्वयं को तार्किक और प्रगतिशील कहने वालों को, प्रश्न तो ये उठाना चाहिए था कि क्या वास्तव में यह प्रथा शास्त्रों में अनिवार्य रूप से वर्णित है, या फिर समय, परिस्थितियों और सामाजिक दबावों के कारण उत्पन्न हुई एक विकृति थी। लेकिन दुर्भाग्य से स्कूली पाठ्यक्रमों और वैचारिक पूर्वाग्रहों के चलते इस विषय को बिना गहराई के एकतरफा रूप में स्थापित कर दिया गया, जिससे न केवल सनातन परंपरा को दोषी ठहराया गया बल्कि इतिहास की जटिलताओं को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इसलिए इस विषय को समझने के लिए भावनात्मक आरोपों से आगे बढ़कर, शास्त्रीय, ऐतिहासिक और तार्किक दृष्टि से विचार करना आवश्यक है।

ऐतिहासिक और शास्त्रीय आधार

सती प्रथा को सनातन धर्म का हिस्सा मानने वाले लोगों से एक सवाल पूछा जाना चाहिए: क्या वे वेदों या उपनिषदों में इसका कोई प्रमाण दे सकते हैं? रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी सती प्रथा का कोई उदाहरण नहीं मिलता…

 रामायण में तो राजा दशरथ की मृत्यु के बाद भी तीनों रानियां जीवित रहती है, यदि हम महाभारत देखे तो लाखों लाखों लाशें गिरी थी, लेकिन कहीं वर्णन नहीं आता कि उसमें स्त्रियों ने सती किया हो और ऐसे कई प्रसंग या सनातन इतिहास मिल जायेगा जहां हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि, यह प्रथा वास्तव में बाद की सामाजिक प्रथाओं से जुड़ी हुई है, न कि मूल वैदिक शास्त्रों और यदि कोई इसे सनातन धर्म का हिस्सा बताता है, तो उसे पहले मूल ग्रंथों से प्रमाण प्रस्तुत करना होगा, क्योंकि बिना प्रमाण के यह केवल मिथ्या प्रलाप ही साबित होता है… 

महर्षि दयानंद सरस्वती का योगदान

 यहां यदि हम सती के विषय में सनातन की क्या विचारधारा है इस पर बात करते हैं तो हमें सर्वप्रथम, महर्षि दयानंद सरस्वती जी का पुणे संवाद याद करना चाहिए, जहाँ सन 1875 में पुणे में उन्होंने एक महत्वपूर्ण घोषणा की और उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वेदों में सती प्रथा की कोई आज्ञा नहीं है। और क्योंकि वेदों का भाष्य करना, व्याकरण और निरुक्त के आधार पर सत्य असत्य का अनावरण करना, यही ऋषि कोटि का कार्य महर्षि दयानंद ने किया है, और साथ ही बड़े-बड़े विद्वानों को खुलकर चुनौती भी दी है कि, वे वेदों से इस प्रथा का कोई सिद्धांत ढूंढकर दिखाएं… और उनका यह योगदान सती प्रथा के खिलाफ एक स्पष्ट प्रमाण है, जो दर्शाता है कि यह प्रथा शास्त्रीय रूप से वैध नहीं है…

अथर्ववेद का प्रमाण

 अब हम इसी विषय पर, स्पष्ट रूप से प्रमाणों पर बात करें, जो जिस सनातन पर सती का आरोप लगाया जाता है, उसी सनातन वैदिक धर्म के मूल ग्रंथ है वेद… 

 इसीलिए आज हम वेदों से प्रमाणित करेंगे कि हमारी संस्कृति में सती प्रथा का कोई भी स्थान नहीं था …

तो सर्वप्रथम है

अथर्ववेद के 18वें कांड, तीसरे सूक्त का दूसरा मंत्र जो सती प्रथा का स्पष्ट खंडन करता है। यह मंत्र उस विधवा महिला को संबोधित करता है जिसके पति की मृत्यु हो चुकी है। मंत्र इस प्रकार है:

उदीर्ष्वनार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि।ह

स्तग्राभस्य दधिषोस्तवेदंपत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ ॥ 18/3/2

भावार्थ:

विपत्ति काल में अर्थात् सन्तान न होने पर पति के बड़े रोगी होने वा मर जाने पर स्त्री मृतस्त्रीक पुरुष से नियोग कर सन्तान उत्पन्न करके पति के वंश को चलावे। इसी प्रकार जिस पुरुष की स्त्री बड़ी रोगिनी हो वा मर गई हो, वह विधवा से नियोग कर सन्तान उत्पन्न करके अपना वंश चलावे ॥२॥

यह मंत्र महिला को मृत पति के पास से उठकर 'जीव लोक' यानी जीवित समाज में वापस लौटने का निर्देश देता है। इसमें उसे नए योग्य पति के साथ जीवन शुरू करने और संतान प्राप्त करने की बात कही गई है। और इस मंत्र के विषय में डिटेल में जानने के लिए आप इस वेबसाइट पर जा सकते हैं जहाँ

डॉ. तुलसी राम की कमेंट्री में भी इसे दूसरे पति या लाइफ पार्टनर के साथ जीवन जोड़ने के रूप में समझाया गया है। यह प्रमाण दर्शाता है कि वेद विधवा को जीवन समाप्त करने की बजाय नए जीवन की शुरुआत करने का मार्ग दिखाते हैं।

तार्किक खंडन

यदि सती प्रथा वास्तव में वेदों की देन होती, तो शास्त्रों में विधवा स्त्री के लिए पुनर्विवाह, संतान के पालन-पोषण, वंश की निरंतरता और संपत्ति की रक्षा जैसे विस्तृत नियम कभी दिए ही नहीं जाते। ये सभी व्यवस्थाएँ केवल तभी अर्थपूर्ण हैं, जब स्त्री जीवित रहे। यदि स्त्री के लिए अग्नि में प्रवेश करना ही अंतिम और अनिवार्य कर्तव्य होता, तो उसके जीवन के लिए बनाए गए ये निर्देश निरर्थक हो जाते। यह तर्क अपने आप में पर्याप्त है यह समझने के लिए कि सती प्रथा किसी धार्मिक आज्ञा का परिणाम नहीं, बल्कि समाज में उत्पन्न हुई एक विकृति थी। वेद जीवन को संरक्षित करने की बात करते हैं, न कि उसे समाप्त करने की।

मिलावट और भ्रम

इतिहास में कुछ लोगों ने वेदों के मंत्रों के अर्थों में जानबूझकर या अज्ञानवश मिलावट करने का प्रयास किया। फिर भी सायण जैसे प्रामाणिक भाष्यकारों ने मूल भाव को पूरी तरह ढकने नहीं दिया। संबंधित मंत्र का मूल अर्थ स्पष्ट है—विधवा को मृत पति के साथ नहीं, बल्कि जीवन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उसे पुनः संसार में लौटने, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने और जीवन को संभालने का निर्देश दिया गया है। इसके विपरीत अर्थ गढ़ना विचारधारात्मक पूर्वाग्रह या अधूरा अध्ययन है। इसी भ्रम के कारण सती प्रथा को हिंदू धर्म से जोड़कर गलत और सरलीकृत प्रचार किया गया, जिससे सत्य विकृत होता चला गया।

निष्कर्ष

सती प्रथा का खंडन किसी एक मंत्र या विचार तक सीमित नहीं है; यह वेदों, तर्क और शास्त्रीय दृष्टि तीनों के आधार पर किया जा सकता है। जो लोग बिना मूल ग्रंथों का अध्ययन किए सती प्रथा के नाम पर सनातन धर्म पर आरोप लगाते हैं, या फिर इसके समर्थन में तर्क देते हैं, वे दोनों ही पक्ष सत्य से दूर खड़े दिखाई देते हैं। सती प्रथा न तो हिंदू धर्म की अनिवार्य परंपरा है और न ही वेदों में इसका कोई समर्थन मिलता है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है यदि किसी वाहन की सर्विस बुक में यह लिखा हो कि टायर पंचर होने पर उसे बदला जाए और यात्रा जारी रखी जाए, तो इसका अर्थ यह कभी नहीं हो सकता कि टायर पंचर होते ही पूरी गाड़ी को आग लगा दी जाए। ठीक इसी प्रकार, वेद विधवा स्त्री को जीवन को पुनः आरंभ करने की शिक्षा देते हैं, न कि उसे समाप्त करने की। यह स्पष्ट करता है कि सती प्रथा एक धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि शास्त्रों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध खड़ी एक ऐतिहासिक भ्रांति है।




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