क्यों जौहर एकमात्र विकल्प बना? जानिए राजस्थान की नारियों का अद्भुत साहस…
राजस्थान ! भारत की वह भूमि जिसके भाग्य मे सर्वाधिक युद्ध और संघर्षो का इतिहास रहा, यह भूमि साक्षी रही उन वीरों की वीरता और शौर्य की, जिन्होने अपनी मातृभूमि के रक्षार्थ - खिलजी जैसे पिशाच हो या मुगलो जैसे आतंकी लुटेरे या अंग्रेज जैसे धूर्त सत्ता लोलुप क्यो ना हो, पग-पग पर इस भूमि के पुत्रो ने, रणांगन में शत्रु जीवन पर प्रलय मचाई और परिणाम स्वरुप विजय या वीरगति स्वीकार की, यहां की माताओ के संकल्प ने ऐसी संतानों को जन्म दिया, जिन्होंने भय शब्द को कभी जीवन में प्रवेश नहीं करने दिया, क्योंकि उन क्षत्रणियों के रक्त में ऐसी उबाल थी, कि चाहे अपनी मातृभूमि के लिए रण आंगन में शत्रुओं पर महाकाली बनाकर टूटना हो , या अपना सर्वस्व बलिदान ही क्यों न करना हो वह त्तपर पर रहा करती थी 🚩 और उन्ही महान नारियों का इतिहास है जोहर…
मुगलों की असली हकीकत: इतिहास जिसे देखने से हमें रोका गया…
लेकिन जौहर को समझने से पहले आपको उस्मानसिकता को समझना होगा… जिसके लिए धर्म अधर्म कुछ मायने ही नहीं रखता था… ये वों नरभक्षी थे,
जो जिस भी राज्य पर आक्रमण करते, उस राज्य का धन लूटने के साथ-साथ वहां के मंदिर, मठ, गुरुकुल तोड़ देते, भयंकर क़त्ले आम मचाते, मासूम बच्चों तक को अपनी कटार का शिकार बना लेते, और इससे सबसे अधिक प्रभावित होता था स्त्रियों का जीवन, जहाँ ये लोगो बच्ची हो, बूढ़ी हो, गर्भवती हो या नवजात हीं क्यों ना हो उसे भोग कि वस्तु समझते, इन नर भक्षियों के लिए ना कोई समय होता था ना कोई नियम होता, कहते हैं कि भारत में युद्ध करने की भी एक परंपरा और नियम होते थे
लेकिन यह एक ऐसी ब्रीड थी जिसके लिए नियम परंपरा और मर्यादा माएने ही नहीं रखती थी, यह स्वयं का वर्चस्व पाने और विजय के लिए कोई भी हद पार कर सकते थे, जिसमे इनको साथ मिला, भारत के कुछ कायर स्वार्थी राजाओं की धूर्तता और समाज के कुछ लोगों की मूर्खता का…जिस कारण यह लोग आकर हमारे ही देश में बसने लगे, जब भारत मे मुगलों ने पैर पसारना आरंभ किया,
मुगल विजय का काला सच: स्त्री, शोषण और जौहर का अंतिम निर्णय :
भारत में बसते बसते, इनकी भूख इतनी बढ़ गयी की, अब भारत को भीतर से निगलने के लिए आक्रमण किये, तब इनका सामना भारत के महानतम योद्धाओं से हुआ, जिनकी वीर गाथाओ से हमारा इतिहास भरा पड़ा है, लेकिन भारतीय इतिहासकार कुछ चंद वर्षों में इस तरह से बिक गए हैं कि वह भारतीय इतिहास के योद्धाओं पर बात ही नहीं करना चाहते, और कुछ प्रपंच यहां तक कह देते हैं मुगलों के हरम में स्त्रियों को बड़ा आदर और सत्कार दिया जाता था… और सहिष्णुता की आड़ में हिंदुओं क़ी संस्कृति को मिटाने की साजिश चलती रही,
हिंदुओं की इसी भ्रमित सहिष्णुता का, इन्होंने बहुत बड़ा लाभ उठाया, एक तरफ वह सभ्यता थी जो शत्रु का भी सत्कार करने की परंपरा में विश्वास रखती थी, दूसरी तरफ वह सभ्यता थी जो मित्र का भी समय आने पर रक्त बहाने से पीछे नहीं हटती, और जब यह दोनों सभ्यताएं आपस में टकराई तब घमासान युद्ध हुआ और भीषण रक्तपात हुआ, जब जब भी यह मुग़ल क्रूर आताताई भारत के महान योद्धाओं से टकराया उन्हें मुंह की खानी पड़ी, परंतु कई बार अपनों की धूर्तता और षड्यंत्र के कारण भारतीय योद्धाओं को हार का सामना भी करना पड़ा,
और इस हार के साथ ही मुगलों का एक काला सच भी सामने आया, जिसने नारियों के ऐसे चरम साहस को दिखाया, जो करना शायद आज किसी भी सभ्यता के बस में नहीं, पिसाची मानसिकता के मुगल जब कभी युद्ध जीत जाते, तो वह जिस राज्य को जीतते वहां की स्त्रियों के साथ बर्बरता करना आरंभ करते थे, वे कोई आयु नहीं देखते, बच्ची बूढ़ी हर आयु की युवति के साथ बलात्कार कर उन्हें अपनी भोग दासी बना लेते, भोगवादी सभ्यताओं के इन लोगों के लिए स्त्रियां एकमात्र भोग की वस्तु थी, इसीलिए वे युद्ध के बाद सबसे पहले महिला हो बच्ची हो हर उम्र की बच्ची का शोषण करते हैं और उन महिलाओं को अपने हरम में रखते जहां वे उन्हें मानसिक और शारीरिक शोषण दिया करते, अपनी विजय के प्रदर्शन के लिए स्त्रियों को नग्न कर पूरे बाजार में घूमाते, और अपनी विजय का प्रदर्शन करते…
उनकी इसी दुष्ट मानसिकता से परिचित थी भारत की नारियां, ऐसा कदापि नहीं था कि भारत की नारियों को युद्ध करना नहीं आता था, परंतु वे नारिया यह जानती थी कि वह युद्ध भी कर लेगी तो भी, ये वो प्रजाति है जो उनके शवों तक को नहीं छोड़ेंगे… इसलिए उन्होंने युद्ध ना चुन कर जोहर चुना, जिससे मुगल राज्य जीतकर भी कभी जीत नहीं पाए, और इन आक्रन्ताओ के हाथ केवल राख लगी…
कैसे किया जाता था जोहार ?
जब भी मुगल सेनाएँ किसी राज्य पर भारी संख्या में आक्रमण करती थीं, तो उनका पहला सामना उन योद्धाओं से होता था जो “साका” करने रणभूमि में उतरते थे।
साका उस स्थिति को कहा जाता था, जब शत्रु की संख्या अत्यधिक हो, संसाधन समाप्त हो चुके हों और विजय की कोई संभावना शेष न रहे। ऐसे समय में राज्य के वीर अंतिम, आत्मघाती युद्ध का संकल्प लेते थे। मुट्ठी भर योद्धा शत्रु की सेना पर टूट पड़ते, उसकी कमर तोड़ते और रक्त की अंतिम बूंद तक युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त होते।
उसी समय, एक ओर रणभूमि में तलवारें गरजती थीं, तो दूसरी ओर दुर्गों के भीतर एक और निर्णय आकार ले रहा होता था। क्षत्राणियाँ अपने पति, पुत्र और भाइयों को विजय तिलक लगाकर, हाथ में तलवार थमाकर युद्ध के लिए विदा करती थीं और स्वयं एक ऐसे बलिदान के लिए तैयार होती थीं, जिसे इतिहास जौहर के नाम से जानता है।
यह केवल आत्मदाह नहीं था, बल्कि यह उस युग की अंतिम मर्यादा, आत्मसम्मान और अस्मिता की रक्षा का निर्णय था।
जौहर के समय, स्त्रियाँ एकत्र होकर माँ भवानी की आराधना करती थीं। एक विशाल अग्निकुंड या चिता सजाई जाती थी, और फिर “जय माँ भवानी” के उद्घोष के साथ वे उसमें प्रवेश करती थीं। कुछ लोक परंपराओं के अनुसार, “जय हर-जय हर” के नाद के साथ हजारों स्त्रियों ने सामूहिक रूप से अग्नि को आलिंगन किया, और यही उद्घोष आगे चलकर “जौहर” कहलाया।
जौहर का उद्देश्य स्पष्ट था, आक्रमणकारियों को यह संदेश देना कि वे युद्ध जीत सकते हैं, दुर्ग तोड़ सकते हैं, परंतु भारतीय स्त्रियों के सम्मान और आत्मसम्मान को कभी नहीं जीत सकते।
कहा जाता है कि जौहर की ज्वाला का ताप सहने की शक्ति म्लेच्छों में नहीं होती थी। मेरा मानना है कि वह ताप अग्नि का नहीं, बल्कि उन स्त्रियों के तेज, संकल्प और आत्मबल का था।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि पहले साका होता था और उसके बाद जौहर, किंतु यह भी कहा जा सकता है कि साका का आरंभ ही जौहर की चिता सजने के साथ हो जाता था क्योंकि तब योद्धा यह जानकर युद्ध में उतरता था कि पीछे अस्मिता सुरक्षित हाथों में है।
लोकगीतों, कविताओं और गाथाओं में जौहर की पीड़ा का वर्णन अवश्य मिलता है, परंतु यह पीड़ा दुर्बलता की नहीं, बल्कि गर्व और दृढ़ता की थी। जौहर उन स्त्रियों के लिए यह प्रमाण था कि वे अपने पिता, पति, पुत्र या भाई की कमजोरी नहीं, बल्कि उनके साहस की आधारशिला हैं।
राजस्थानी लोकपंक्ति
“क्षत्रिय करते युद्ध हुंकार, क्षत्राणी पग आगे चार”
इस सत्य को सशक्त रूप से उद्घाटित करती है।
प्रमुख ऐतिहासिक जौहर (संक्षेप में)
चित्तौड़ (1303) – रानी पद्मिनी सहित लगभग 16,000 स्त्रियाँ
मेवाड़ (1535) – महारानी कर्णावती व लगभग 13,000 स्त्रियाँ
चित्तौड़ (1568) – अकबर के आक्रमण के समय
जैसलमेर (1294, 1315) – तुगलक और खिलजी काल
रणथंभौर, जालौर, चंदेरी (1528) – महारानी मणिमाला खंगार
सिंध (712) – राजा दाहिर की रानी द्वारा जौहर
ये घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि जौहर कोई अपवाद नहीं, बल्कि उस युग की भयावह परिस्थितियों की प्रतिक्रिया था।
आधुनिक विमर्श और ऐतिहासिक ईमानदारी
आज जौहर की आलोचना करना आसान है,लेकिन अक्सर आलोचना करने वाले लोग आक्रांताओं की क्रूरता, स्त्रियों के साथ किए गए अपराधों और उस समय के सामाजिक विकल्पों पर मौन रहते हैं।
जौहर को समझना उसे महिमामंडित करना नहीं है, बल्कि उस अमानवीय स्थिति को स्वीकार करना है जिसने स्त्रियों को ऐसा निर्णय लेने पर विवश किया और यह नारी-विरोधी परंपरा नहीं, बल्कि कोई परंपरा ही नहीं थी ये तो नारी के सम्मान की अंतिम रक्षा थी…और साथ ही यह किसी आदर्श समाज का प्रतीक भी नहीं थी, बल्कि आक्रांताओं की बर्बरता का प्रमाण थाजौहर ने यह स्पष्ट किया कि पराजय के बाद भी भारत की स्त्रियाँ आत्मसमर्पण नहीं करती थींजौहर को समझना इतिहास को समझना है और इतिहास को समझना, उसे नकारना नहीं,बल्कि उससे सीख लेना है….

Comments
Post a Comment