Women VS स्त्री : संबोधित करने वाले शब्दों की गहन तुलना
Women VS स्त्री : संबोधित करने वाले शब्दों की गहन तुलना
आजकल जब भी सनातन धर्म पर हमला बोलने की बात आती है, तो कुछ तथाकथित फेमिनिस्ट बिना पूर्ण ज्ञान के हमारे महान धर्म को निशाना बनाना शुरू कर देते हैं। उन्हें विषय का ज्ञान हो या न हो, वे अपनी सीमित बुद्धि का परिचय देते हुए, सनातन धर्म की महानता को समझे बिना, पाश्चात्य सभ्यता से तुलना किए बिना, बस मीम्स और आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। उनका मानना है कि सनातन धर्म में स्त्री का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, जबकि पश्चिम ही सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है।
सनातन संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति – चाहे स्त्री हो या पुरुष – को अपना स्वतंत्र अस्तित्व, व्यक्तित्व और महत्व दिया गया है। यहां किसी का अस्तित्व दूसरे के पीछे दबा हुआ नहीं है। दोनों का अपना अलग सम्मान और स्थान है। वहीं पाश्चात्य सभ्यता में स्त्री का कोई स्थिर, स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिखता। यह केवल शाब्दिक दावे नहीं हैं, बल्कि इसके कई प्रमाण हैं। आज हम इन्हीं सभ्यताओं में स्त्री और पुरुष को संबोधित करने वाले शब्दों की व्युत्पत्ति (etymology) पर चर्चा करेंगे, जो उनकी सोच को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं।
पाश्चात्य और अन्य भाषाओं में स्त्री के शब्द: अधीनता और सीमित भूमिका का प्रमाण
Lady और Lord की जोड़ी
अंग्रेजी में स्त्रियों को "Ladies" कहकर संबोधित किया जाता है। इसका मूल पुरानी अंग्रेजी शब्द "hlæfdige" में है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "bread-kneader" यानी रोटी गूंथने वाली। वहीं पुरुष के लिए "Lord" है, जो "hlaford" से आया, अर्थ "bread-keeper" – रोटी का रखवाला या रक्षक।
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है: क्या स्त्री का अर्थ केवल रोटी बनाने वाली तक सीमित है? एक क्षत्राणी, संगीतज्ञ, विदुषी, योद्धा या शासिका स्त्री को क्या कहेंगे? इस शब्द की व्युत्पत्ति से साफ है कि उस समाज में स्त्री की मुख्य भूमिका घरेलू कार्य तक मानी जाती थी। क्या रक्षक हमेशा पुरुष ही होगा और खाना बनाने वाली हमेशा स्त्री? यह खुद में भेदभाव की जड़ दिखाता है।
आश्चर्य की बात है कि ये दोगले फेमिनिस्ट इन शब्दों पर कभी सवाल क्यों नहीं उठाते? यहां उन्हें कोई तकलीफ क्यों नहीं होती?
Woman
अंग्रेजी का एक और प्रमुख शब्द "Woman" पुरानी अंग्रेजी "wifman" से आया है, जो "wife-man" का बदला रूप है। यहां स्त्री को पुरुष ("man") से व्युत्पन्न माना गया, जैसे उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व न हो। मूल अर्थ पुरुष के अधीन रहने वाली या नौकर जैसा है। यहां फेमिनिज्म कहां चला जाता है? किसी को स्त्री पर अत्याचार क्यों नहीं दिखता?
Female
इस शब्द में भी "male" छिपा है। स्त्री के लिए कोई पूरी तरह स्वतंत्र शब्द नहीं, बल्कि पुरुष के शब्द से तुलना या व्युत्पत्ति। यह दर्शाता है कि स्त्री को पुरुष की छाया या विपरीत के रूप में ही देखा जाता था।
औरत (उर्दू/फारसी प्रभाव वाली भाषा में)
स्त्रियों को "औरत" कहकर पुकारा जाता है। इसकी जड़ अरबी "awrah" में है, जिसका अर्थ है नग्नता, जननांग, दोष, कमजोरी या शर्म की जगह। आक्रांताओं ने भारत पर हमला करते समय स्त्रियों को केवल उपभोग की वस्तु माना और यह शब्द इस्तेमाल किया। आज भी बिना अर्थ जाने हम हर स्त्री को "औरत" कहते हैं, जो घोर अपमान है। लेकिन फेमिनिस्ट यहां चुप क्यों हैं ? क्योंकि बात पश्चिम या आक्रांताओं की हो तो उनकी आंखों में मोतियाबिंद आ जाता है।
इन सभी शब्दों से साफ होता है कि उन सभ्यताओं में स्त्री को या तो घरेलू कार्य, अधीनता, नौकरानी या केवल जननांग तक सीमित माना गया। यही वजह है कि पश्चिम में "Women Empowerment" की जरूरत पड़ी – क्योंकि वहां स्त्री की दुर्दशा थी।
सनातन धर्म में स्त्री के शब्द: स्वतंत्रता, सम्मान और गुणों का प्रतीक
अब सनातन धर्म की ओर देखिए, जहां स्त्री को हमेशा स्वतंत्र, पूजनीय और सशक्त माना गया है। शब्दों की व्युत्पत्ति ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है:
स्त्री
संस्कृत "स्त्री" शब्द "स्त्यै" या "सत्य" धातु से बनता है। एक प्रसिद्ध निर्वचन है: "सत्या ति गर्भ स्याम अतः स्त्री" – वह जो गुणों को ग्रहण करे या जिसमें गर्भ संभव हो। अर्थात स्त्री वह है जो गुण ग्रहण करने वाली, सृजनशील और संघात करने वाली हो। यहां स्त्री को गुणवान और सृजनकर्त्री के रूप में सम्मान दिया गया – कोई सीमा नहीं।
महिला
"मह्" धातु से बना, जिसका अर्थ है सम्मान करना, पूजा करना, पूर्ण समझना। जो आदरणीय और पूजनीय हो, वह महिला। यह शब्द स्त्री को पूजा की योग्य बताता है।
नारी
"नृ" धातु से, अर्थ मनुष्य जाति का पालन करने वाली या नेतृत्व करने वाली। स्त्री को मानवता की धारक और नेता माना गया।
इसके अलावा कई अन्य महान शब्द:
देवी: दिव्य गुणों को धारण करने वाली।
धर्मपत्नी: धर्म का आचरण करने वाली पत्नी।
गृहणी या गृहलक्ष्मी: घर की लक्ष्मी, समृद्धि और धन की देवी।
ये शब्द छोटी कन्या से लेकर वृद्धा तक, विवाहित हो या अविवाहित, ब्रह्मचारिणी हो या विधवा – सभी के लिए उपयोग होते हैं। यहां स्त्री को देवी तुल्य सम्मान है, स्वतंत्र अस्तित्व है। विवाहित जोड़े के लिए "पति-पत्नी" है, लेकिन संपूर्ण नारी जाति के लिए "स्त्री", "महिला", "नारी" जैसे तीन स्वतंत्र, महान शब्द हैं।
अंतिम विचार: सत्य क्या है?
पाश्चात्य भाषाओं में स्त्री के लिए शब्दों में भेदभाव, अधीनता और सीमाएं छिपी हैं – चाहे "woman" में "man" हो, "female" में "male" हो या "lady" में रोटी गूंथने वाली। इन शब्दों की जड़ें बताती हैं कि उन समाजों में स्त्री की क्या स्थिति थी। वहीं सनातन धर्म में स्त्री स्वतंत्र, गुणवान, पूजनीय और सशक्त है।
सनातन धर्म पर नारी-विरोध का आरोप लगाने वाले वामपंथी, विधर्मी और मैकाले के पुत्र पहले अपनी अंग्रेजी भाषा के गिरेबान में झांकें। उसमें नारी जाति के लिए कोई स्वतंत्र शब्द तक नहीं है। हम विदेशी शब्दों का प्रयोग करने के खिलाफ नहीं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि उनकी जड़ों में छिपा भेदभाव क्या बताता है।
हमारी सभ्यता में स्त्री देवी है, महिला है, नारी है – स्वतंत्र और समर्थ। यही सनातन की महानता है।





