क्या था भारत की नारियों का वास्तविक इतिहास ?
किंतु समय के साथ मुगल आक्रांताओं के आगमन एवं उनकी भोग-विलासपूर्ण नीतियों ने हमारे समाज को कलुषित करना प्रारंभ किया। स्त्रियों को वेदों से दूर कर उन्हें घर की चारदीवारी में सीमित कर दिया गया, जिससे उनका बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो गया। फलस्वरूप वे अन्य अधिकारों से भी वंचित होती गईं। यह सब स्वार्थपूर्ण षड्यंत्र था ताकि स्त्रियों की शक्ति एवं सामर्थ्य दबी रहे। बाद में अंग्रेजी शासन ने भी इस पुरुष-प्रधानता को और प्रज्वलित किया। परिणामस्वरूप हमारे गौरवशाली इतिहास से असंख्य विदुषी, वीरांगना, ऋषिका एवं भक्त नारियों के नाम एवं कार्य धीरे-धीरे लुप्त कर दिए गए।
यदि हम निष्पक्ष भाव से वेदों का अध्ययन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक समाज में स्त्री को सर्वोच्च सम्मान एवं पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। वेदों में स्त्रियों को शिक्षा, यज्ञ, उपदेश, योग, चिकित्सा, राजनीति, युद्धकला, कृषि एवं अनेकानेक विद्याओं में समान अधिकार दिए गए हैं।
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति
वैदिक काल में स्त्रियां आदिशक्ति के रूप में उपस्थित थीं और वे आज की तुलना में कहीं अधिक उन्नत थीं। वेदों में 30 से अधिक ऋषिकाओं के नाम मिलते हैं, जिनमें घोषा, अपाला और विश्रवा , जिन्होंने स्वयं सूक्तों की रचना की।
ऋग्वेद (1.164.41) के अनुसार-
गौ॒रीर्मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॒त्येक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी। अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा॑क्षरा पर॒मे व्यो॑मन् ॥
भावार्थ- जो स्त्री समस्त साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़के पढ़ाती हैं, वे सब मनुष्यों की उन्नति करती हैं ॥ ४१ ॥
ऋग्वेद (1.125.5) के अनुसार-
नाक॑स्य पृ॒ष्ठे अधि॑ तिष्ठति श्रि॒तो यः पृ॒णाति॒ स ह॑ दे॒वेषु॑ गच्छति। तस्मा॒ आपो॑ घृ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑व॒स्तस्मा॑ इ॒यं दक्षि॑णा पिन्वते॒ सदा॑
भावार्थ- जो मनुष्य इस मनुष्य देह का आश्रय कर सत्पुरुषों का सङ्ग और धर्म के अनुकूल आचरण को सदा करते वे सदैव सुखी होते हैं। जो विद्वान् वा जो विदुषी पण्डिता स्त्री, बालक, ज्वान और बुड्ढे मनुष्यों तथा कन्या, युवति और बुड्ढी स्त्रियों को निष्कपटता से विद्या और उत्तम शिक्षा को निरन्तर प्राप्त कराते, वे इस संसार में समग्र सुख को प्राप्त होकर अन्तकाल में मोक्ष को अधिगत होते अर्थात् अधिकता से प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥
यह दर्शाता है कि वैदिक समाज में स्त्रियां न केवल शिक्षित थीं, बल्कि समाज के विकास में सक्रिय योगदान देती थीं।
शिक्षा और समानता का अधिकार
वेदों में बालक और बालिकाओं की शिक्षा में कोई भेद नहीं बताया गया है।
ऋग्वेद (6.44.18) कहता है-
आ॒सु ष्मा॑ णो मघवन्निन्द्र पृ॒त्स्व१॒॑स्मभ्यं॒ महि॒ वरि॑वः सु॒गं कः॑। अ॒पां तो॒कस्य॒ तन॑यस्य जे॒ष इन्द्र॑ सू॒रीन्कृ॑णु॒हि स्मा॑ नो अ॒र्धम् ॥१८॥
भावार्थ- राजा वैसा यत्न करे जैसे अपनी सेनायें उत्तम प्रकार शिक्षित, जीतनेवाली और बलयुक्त होवें और सम्पूर्ण बालक और कन्यायें ब्रह्मचर्य्य से विद्यायुक्त होकर समृद्धि को प्राप्त हुए सत्य, न्याय और धर्म का निरन्तर सेवन करें ॥१८॥
यजुर्वेद (10.7) के अनुसार,
स॒ध॒मादो॑ द्यु॒म्निनी॒राप॑ऽए॒ताऽअना॑धृष्टाऽअप॒स्यो वसा॑नाः। प॒स्त्यासु चक्रे॒ वरु॑णः स॒धस्थ॑मपा शिशु॑र्मा॒तृत॑मास्व॒न्तः॥७॥
भावार्थ- राजा को चाहिये कि अपने राज्य में प्रयत्न के साथ सब स्त्रियों का विद्वान् और उनसे उत्पन्न हुए बालकों को विद्यायुक्त धाइयों के अधीन करे कि जिससे किसी के बालक विद्या और अच्छी शिक्षा के विना न रहें और स्त्री भी निर्बल न हो॥७॥
ऋग्वेद (10.191.3) कहता है-
स॒मा॒नो मन्त्र॒: समि॑तिः समा॒नी स॑मा॒नं मन॑: स॒ह चि॒त्तमे॑षाम् । स॒मा॒नं मन्त्र॑म॒भि म॑न्त्रये वः समा॒नेन॑ वो ह॒विषा॑ जुहोमि ॥
भावार्थ- ईश्वर सन्देश देते हुए कह रहे हैं की हे समस्त नर नारियों ! तुम्हारे लिए ये मंत्र समान रूप से दिए गए हैं तथा तुम्हारा परस्पर विचार भी समान रूप से हो। मैं तुम्हें समान रूप से ग्रंथों का उपदेश करता हूँ।
यजुर्वेद (14.2) के अनुसार,
इमा | ब्रह्म॑ | पीपिहि |
भावार्थ- सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वेदमंत्रों के अमृत का बार बार अच्छी प्रकार से पान कर।
अथर्ववेद (14.1.7) स्पष्ट करता है,
रैभ्या॑सीदनु॒देयी॑ नाराशं॒सी न्योच॑नी। सू॒र्याया॑ भ॒द्रमिद्वासो॒ गाथ॑यति॒परि॑ष्कृता ॥
भावार्थ- कन्या वेदों और इतिहासों को पढ़कर विचारकर शुभ कर्म करती हुई उत्तम विद्या से अपनी शोभा बढ़ावे ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।६ ॥
यह समानता का स्पष्ट प्रमाण है कि वेदों में स्त्रियों को शिक्षा का पूर्ण अधिकार प्राप्त था।
विवाह और आत्मनिर्भरता
वेदों में बाल विवाह का कोई वर्णन नहीं है; इसके विपरीत, कन्याओं को पहले ब्रह्मचर्य और विद्या प्राप्त करने का आदेश है।
यजुर्वेद (19.15) में-
सोम॑स्य रू॒पं क्री॒तस्य॑ परि॒स्रुत्परि॑षिच्यते। अ॒श्विभ्यां॑ दु॒ग्धं भे॑ष॒जमिन्द्रा॑यै॒न्द्रꣳ सर॑स्वत्या॥१५॥
भावार्थ - सब कुमारियों को योग्य है कि ब्रह्मचर्य से व्याकरण, धर्म, विद्या और आयुर्वेदादि को पढ़, स्वयंवर विवाह कर, ओषधियों को और औषधवत् अन्न और दाल कढ़ी आदि को अच्छा पका, उत्तम रसों से युक्त कर, पति आदि को भोजन करा तथा स्वयं भोजन करके बल, आरोग्य की सदा उन्नति किया करें ॥१५॥
ऋग्वेद (1.71.3) के अनुसार,
दध॑न्नृ॒तं ध॒नय॑न्नस्य धी॒तिमादिद॒र्यो दि॑धि॒ष्वो॒३॒॑ विभृ॑त्राः। अतृ॑ष्यन्तीर॒पसो॑ य॒न्त्यच्छा॑ दे॒वाञ्जन्म॒ प्रय॑सा व॒र्धय॑न्तीः ॥
भावार्थ - जैसे वैश्य लोग धर्म्म के अनुकूल धन का संचय करते हैं, वैसे ही कन्या विवाह से पहले ब्रह्मचर्यपूर्वक पूर्ण विद्वान् पढ़ानेवाली स्त्रियों को प्राप्त हो पूर्णशिक्षा और विद्या का ग्रहण तथा विवाह करके प्रजासुख को सम्पादन करे। विवाह के पीछे विद्याध्ययन का समय नहीं समझना चाहिये। किसी पुरुष वा स्त्री को विद्या के पढ़ने का अधिकार नहीं है, ऐसा किसी को नहीं समझना चाहिये, किन्तु सर्वथा सबको पढ़ने का अधिकार है ॥३॥
यह दर्शाता है कि वैदिक काल में स्त्रियां आत्मनिर्भर थीं और अपने जीवनसाथी का चुनाव स्वयं कर सकती थीं।
विभिन्न विधाओं में निपुणता
वेदों में स्त्रियों को केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें अनेक विद्याओं को सीखने के निर्देश दिए गए हैं। स्त्रियों को यज्ञ करने, विदुषी बनने और उपदेश देने का पूर्ण अधिकार है।
यजुर्वेद के अध्याय 11 मंत्र 60 में स्त्रियों को न्याय विद्या ग्रहण करने का उपदेश है, जबकि ऋग्वेद के मण्डल 2 के सूक्त 41 मंत्र 17 में योग विद्या सीखने की बात कही गई है। यजुर्वेद के अध्याय 12 के मंत्र 88, 92, 94 के अनुसार, स्त्रियां वैद्य (डॉक्टर) बन सकती हैं और उन्हें औषधियों के विज्ञान पर चर्चा करनी चाहिए। इसके अलावा, यजुर्वेद के अध्याय 38 के मंत्र 4 में स्त्रियों को विद्युत विद्या जानने , युद्ध कौशल, वाहन चलाना, कृषि, भोजन पकाने , सलाई करने, भूगोल शास्त्री बनने और भूमि विज्ञान के सीखने के आदेश तथा अधिकार दिए गए हैं।
यजुर्वेद (13.16) में-
ध्रु॒वासि॑ ध॒रुणास्तृ॑ता वि॒श्वक॑र्मणा। मा त्वा॑ समु॒द्रऽ उद्व॑धी॒न्मा सु॑प॒र्णोऽअव्य॑थमाना पृथि॒वीं दृ॑ꣳह॥१६॥
भावार्थ- जैसी राजनीति विद्या को राजा पढ़ा हो, वैसी ही उसकी राणी भी पढ़ी होनी चाहिये। सदैव दोनों परस्पर पतिव्रता, स्त्रीव्रत हो के न्याय से पालन करें। व्यभिचार और काम की व्यथा से रहित होकर धर्मानुकूल पुत्रों को उत्पन्न करके स्त्रियों का स्त्री राणी और पुरुषों का पुरुष राजा न्याय करे॥१६॥
यजुर्वेद (29.50) में-
आ ज॑ङ्घन्ति॒ सान्वे॑षां ज॒घनाँ॒२ऽउप॑ जिघ्नते। अश्वा॑जनि॒ प्रचे॑त॒सोऽश्वा॑न्त्स॒मत्सु॑ चोदय॥५०॥
भावार्थ- जैसे राजा और राजपुरुष विमानादि रथ और घोड़ों के चलाने तथा युद्ध के व्यवहारों को जानें, वैसे उनकी स्त्रियां भी जानें॥५०॥
यजुर्वेद (12.88) में वर्णित है-
अ॒न्या वो॑ऽअ॒न्याम॑वत्व॒न्यान्यस्या॒ऽउपा॑वत। ताः सर्वाः॑ संविदा॒नाऽइ॒दं मे॒ प्राव॑ता॒ वचः॑॥८८॥
भावार्थ- जैसे श्रेष्ठ नियम वाली स्त्री एक-दूसरे की रक्षा करती हैं, वैसे ही अनुकूलता से मिलाई हुई ओषधी सब रोगों से रक्षा करती हैं। हे स्त्रियो! तुम लोग ओषधिविद्या के लिये परस्पर संवाद करो॥८८॥
यह बहुमुखी विकास वैदिक स्त्रियों की शक्ति को दर्शाता है।
निष्कर्ष
वैदिक युग में स्त्रियाँ पूर्ण स्वतंत्र एवं सशक्त थीं। यदि आज की नारियाँ अपने इस गौरवमय वैदिक विरासत की ओर ध्यान दें, वेदों का अध्ययन करें तथा अपने मूल स्वभाव को पहचानें, तो भारत पुनः विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर होगा। कल्पना कीजिए उस स्वर्णिम भारत की, जहाँ गार्गी जैसी विदुषियाँ ज्ञान-सभाओं में प्रश्नों की वर्षा करेंगी, अपाला एवं घोषा जैसी ऋषिकाएँ नवीन सूक्त रचेंगी, तथा प्रत्येक स्त्री विद्या, वीरता एवं आध्यात्मिकता से संपन्न होकर समाज का मार्गदर्शन करेगी।
यह स्वप्न तभी साकार होगा जब हम अपने वेदों की ओर लौटेंगे, स्त्रियों को उनका वैदिक अधिकार पुनः सौंपेंगे तथा सनातन धर्म की उन महान नारियों के इतिहास को पुनर्जीवित करेंगे जिन्होंने विश्व को ज्ञान की ज्योति प्रदान की थी।


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