Saturday, March 9, 2024

जिनकी ललकार से म्रत्यु भी भयाक्रांत हो गई थी - जवाहर बाई राठौड़..

 जवाहर बाई राठौड़..


जिनकी ललकार से म्रत्यु भी भयाक्रांत हो गई थी


इतिहास गवाह है कई बार कायर को सिंहनी ब्याही गई पर समय आने पर वही सिंहनी रणचण्डी बन  उठ खड़ी हुई !

यह उस कालखंड की घटना है जब महाराणा के महाप्रयाण के पश्चात उनके पद पे विक्रमादित्य आरूढ़ हुए..

विक्रमादित्य एक विलासी और अयोग्य शाशक थे जिनका विवाह मेवाड़ की सिंहनी कहलाई जाने वाली जवाहर बाईसा से हुआ था..


अपनी अयोग्यता के कारण जब विक्रमादित्य बहादुर शाह के हाथों पराजित हो गए


 राजपुताना इतिहास के अनुसार तब रानी कर्मावती के नेतृत्व में मेवाड़ की वीरांगनाओ ने जौहर हेतु  जौहर कुंड में अग्नि प्रज्वल्लन कर ली थी म्रत्यु के वरण हेतु जब मेवाड़ की वीरांगनाओ ने अग्निकुंड में  प्रवेश करना चाहा उसी क्षण एक ललकार गुंजायमान हुई ..की हम जौहर नही करेंगे, यह ललकार विक्रमादित्य की म्रत्यु के पश्चात वैधव्य को प्राप्त होने वाली सिंहनी जवाहर बाई सा की थी 


जवाहर बाई सा ने हुंकार भरते हुए कहा कि यदि म्रत्यु को प्राप्त होना ही लक्ष्य है तो मातृभूमि के लिए लड़ते हुए वीरगति का चयन करेंगे न कि सतीत्व की रक्षार्थ शौर्य प्रदर्शन करते हुए जौहर करेंगे...





राजपूत नारियों को  जवाहर बाई ने ललकारते हुए कहा-"वीर क्षत्राणियों ! जौहर करके हम सिर्फ अपने सतीत्व की ही रक्षा कर पाएंगी, इससे अपने देश की रक्षा नहीं सकती। उसके लिए तो तलवार लेकर शत्रु सेना से युद्ध करना होगा। हमें हर हाल में मरना तो है ही, इसलिए चुपचाप और असहाय की भांति जौहर की ज्वालाओं में जलने से अच्छा है हम शत्रु को मार कर मरें। युद्ध में शत्रुओं का ख़ून बहाकर रणगंगा में स्नान कर अपने जीवन को ही नहीं अपनी मृत्यु को भी सार्थक बनाएँ। रानी जवाहर बाई की इस ललकार को सुनकर जौहर को उद्धत कई अगणित राजपूत वीरांगनाएं हाथों में तलवारें थाम युद्ध के लिए उद्धत हो गई। चितौड़ के किले में एक ओर जौहर यज्ञ की प्रचंड ज्वालाएँ धधक रही थी तो दूसरी ओर एक अद्भुत आग का दरिया बह रहा था। 

रानी जवाहर बाई के नेतृत्व में घोड़ों पर सवार, हाथों में नंगी तलवारें लिए वीर वधुओं का यह दल शत्रु सेना पर कहर ढा रहा था। जवाहर बाई सा की एक ललकार पे असंख्य वीरांगनाओ ने शस्त्रसन्धान करते हुए रणचण्डी का स्वरूप धारण कर रण आंगन में प्रवेश किया.. उन असंख्य वीरांगनाओ में कई स्त्रियां गर्भ धारण किये हुए थी ..किन्तु हाथ मे खड्ग और नंगी तलवार लिए उन वीरांगनाओ ने रण क्षेत्र को रक्त वैतरणी में परिवर्तित कर दिया ... इस प्रकार सतीत्व के साथ स्वत्व और देश रक्षा के लिए रानी जवाहर बाई के नेतृत्व में इन क्षत्रिय वीरांगनाओं ने जो अद्भुत शौर्य प्रदर्शन किया करते हुए वीरगति प्राप्त की।

भारतीय नारी का यह प्रचण्ड रूप साक्षात म्रत्यु का ताण्डव प्रतीत हो रहा था...अपने इसी शौर्य और वीरता का प्रदर्शन करते हुए जवाहर बाई सा ने अपनी मातृभूमि के लिए म्रत्यु का वरण किया....

Tuesday, March 5, 2024

निर्भीकता की परिभाषा रानी अब्बका...

 निर्भीकता की परिभाषा रानी अब्बका...



अब्बका का जन्म स्थान उल्लाल नामक नगर के चौटा राजघराने में हुआ था। चौटा राजवंश मातृवंशीय परंपरा का पालन किया गया

मातृवंशीय परंपरा एक नारी प्रधान समाजिक व्यवस्था थी, जिसके अनुसार किसी भी पद या नारी का स्थान या प्राथमिक प्रमुख होता था और संपत्ति और शासन का अधिकार पुत्रियों के स्थान पर पुत्रियों को दिया जाता था। 

इसी परंपरा के अनुसार अब्बका के मामा तिरुमला राय ने उन्हें उल्लाल नगर की रानी के पद पर स्थापित किया था।

 रानी अब्बका के युद्ध और शासन व्यवस्था में अचयनिता प्राप्त हुई थी...

अब्बका का पेज प्रेम वात्सल्य एवं न्याय प्रियता..

उनके शासन में जैन, हिंदू और मुस्लिम धर्म के लोग समान रूप से रहते थे। उनकी सेना में सभी धर्मों, संप्रदायों और समुदायों के लोग थे। लोककथाओं की कहानियाँ तो वे एक न्यायप्रिय रानी थीं और इसी कारण से वे उन्हें बहुत पसंद भी करती थीं। 


रानी अब्बका का रानी कौशल

ऐसा भी माना जाता है कि रानी अब्बक्का युद्ध में अग्निबाण का प्रयोग करने वाली अंतिम योद्धा थीं 

उनके अच्छे संस्करण और वीरता के कारण ही उन्हें 'अभया रानी' भी कहा जाता था.. अभया रानी अर्थात निर्भया रानी की पराकाष्ठा


पुर्तगालियों का विरोध मोर्चा

रानी अब्बक्का के मामा तिरुमला राय ने अपनी शादी मंगलुरु के बंगा रियासत के राजा लक्ष्मप्पा अरसा के साथ की थी, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही रानी अब्बक्का अपने पति से अलग हो गईं और छात्र उलाल आ गईं...

उनके खिलाफ कोई खतरा नहीं था कि आने वाले समय में पति लक्ष्मप्पा ने इस बात का बदला लेने के लिए अपनी लड़ाई में अपने पुर्तगालियों का साथ दिया था...

रानी अब्बक्का युद्ध में अग्निबाण का उपयोग करने वाली आखिरी जगह..


वर्ष 1525 में पुर्तगालियों ने दक्षिण कन्नड़ के तट पर आक्रमण किया और मंगलुरु के बंदरगाह को मजबूत किया.. लेकिन उल्लाल ने अपने अधिपति की स्थापना नहीं की..

 रानी अब्बक्का की नोक-झोंक से चिंतित पुर्तगालियों ने यह दबाव बनाने की कोशिश की कि रानी उन्हें कर चुकाए 

लेकिन रानी अब्बक्का ने शांति बहाल करने का प्रयास किया... बाद में वर्ष 1555 में पुर्तगालियों ने आक्रमण का प्रयास किया, रानी अब्बका ने उन्हें असफल करने का प्रयास किया...


समय का फेर


वर्ष 1568 में पुर्तगीज बहाली में उल्लाल पर आक्रमण करने की बात आई थी, लेकिन रानी अब्बक्का ने फिर से ज़ोरदार विरोध किया, इस बार उल्लाल सेना उल्लाल पर अधिकार करने में सफल रही और राज दरबारों में आक्रमण आई..

 रानी अब्बक्का वहां से बचकर निकलीं और शरण ली ने एक मस्जिद में प्रवेश किया, समुद्र तट पर साहस न करते हुए वीरता का परिचय दिया, उसी रात करीब 200 सेना इकट्ठी की रानी अब्बक्का ने पुर्तगालियों पर धावा दिया और उस में बोल युद्ध के जनरल को मारा गया गया,कैली सैनिक बंदी बनाये गये और कई सैनिक सैनिक युद्ध के लिए पीछे हट गये...

उनके बाद रानी अब्बक्का ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुर्तगालियों को मंगलुरु का किला छोड़ कर बाउंड कर दिया..

 लेकिन वर्ष 1569 में पुर्तगालियों ने ना सिर्फ मंगलुरु का किला हासिल किया बल्कि कुंडपुरा पर भी अधिकार कर लिया। पुर्तगालियों के लिए बनी है इन अनोखी रानी अब्बक्का एक बड़ा खतरा..

इस दौरान रानी अब्बका के पति लक्ष्मप्पा ने पुर्तगालियों की सहायता के लिए और शक्तिशाली सेना उल्लाल पर फिर से आक्रमण करने के लिए अपना परिवर्तन लिया... लेकिन रानी अब्बका अब भी शहीद हो गईं।

 उन्होंने वर्ष 1570 में अहमदनगर के सुल्तान और कालीकट के राजा के साथ मिलकर पुर्तगालियों का विरोध किया।

अपने पति लक्ष्मप्पा की धोखेबाज़ रानी अब्बक्का से लड़ाई हार गईं और उन्हें बंदी बना लिया गया...

तथापि ऐसा कहा जाता है कि बंदी के बाद रानी अब्बाका ने भी विद्रोह कर दिया था - किले में वे अंतिम सांस ली थी...

वीर रानी अब्बक्का उत्सव

आज भी रानी अब्बक्का उत्सव की याद में उनके नगर में उल्लाल उत्सव मनाया जाता है और इस 'वीर रानी अब्बक्का उत्सव' में प्रतिष्ठित महिलाओं को 'वीर रानी अब्बक्का संरक्षण' पुरस्कार से नवाजा जाता है।

Saturday, January 20, 2024

पाटण की रानी #रुदाबाई जिसने सुल्तान बेघारा के सीने को फाड़ कर दिल निकाल लिया था

 रानी रूदा... एक प्रचण्ड प्रहार



भारतीय इतिहास के पाटन और कर्णावती दो छोटे साम्राज्य थे, जहाँ राणा वीर सिंह राज करते थे.. राणा वीर सिंह के अर्धांगिनी रूप में रुदा बाई के नाम से भी जाना जाता था, जो उनके राजकार्य में उनकी सहायक बनी थीं.. .रूपबा की सौंदर्य कीर्ति आसपास के राज्य में संग्रहालय थी, शेष रिपब्लिकन मलेचो के सुल्तान तक पहुंच गई थी...

मूलतः अपनी आसुरी वृत्ति के वशीभूत रहने वाले जिहादी खोज के साथ आक्रमणकारी ने पाटन पर ढावा बोल दिया..

प्राचीन भारतीय संस्कृति में नारी के मन के प्राण लेने के लिए उनके साम्हने के अनुसार राणा वीर सिंह वाघेला ढाल बन कर दिए गए। ,बेघरा को बुरी तरह परजाय की चोट खानी पड़ी


राणा वीर सिंह वाघेला की फ़ौज छब्बीस सौ से अथाइस सौ की तादात में थी क्योंकि कर्णावती और पाटन बहुत ही छोटे छोटे दो राज्य थे। इनमें से अधिकांश फ़ौज की आवश्यकता समान नहीं थी। राणा जी की रणनीति ने चार लाख जेहादी लुटेरों की फौज को बर्बाद कर दिया था।


इतिहास गवाह है कि कुछ हमारे ही भेद ऐसे के हुए थे, जो दुश्मनों से बार-बार मिल जाते थे, कुछ लाल और लोभ में, इसी तरह दूसरे युद्ध में राणा जी के साथ रहने वाले, मित्र साहूकार ने राणा वीर सिंह को धोखा दिया था ।। बहुसंख्यक साहूकार जा ने सुल्तान बेघारा से और साड़ी गुप्त जानकारी उन्हें प्रदान कर दी, जिस जानकारी से राणा वीर सिंह को परास्त कर रानी रुदाबाई और पाटण की गद्दी को बुलाया जा सकता था। सुल्तान बेघारा ने धन दौलत लूटने की योजना राणा वीरसिंह वाघेला के साथ मिलकर बनाई।


सुल्तान बेघारा ने कहा कि अगर युद्ध में जीत गए तो जो मांगोगे सोना, तब साहूकार की नजर राणा वाघेला की थी और सुल्तान बेघारा की नजर रानी रुदाबाई को अपने हरम में रखने की और पाटन राज्य की राजगद्दी पर आसीन राज करने की था।


सन् 1498 ईसवीं (संवत् 1555) दो बार युद्ध होने के बाद परास्त के सुल्तान बेघारा ने तीसरी बार दुगनी सैन्यबल के साथ मिलकर जानकारी प्राप्त की, राणा वीर सिंह की सेना ने अपने से दुगनी सैन्यबल को भी रणभूमि में देखा। जब राणा जी सुल्तान बेघारा की सेना में शामिल होकर आगे बढ़े थे, तब उनके मित्र डी शेयरधारक ने युद्ध में पीछे से युद्ध किया था, जिससे राणा जी की रणभूमि में मृत्यु हो गई थी। गया ।



रानी रूदाबाई ने महल के ऊपर छावनी बनवाई

सुल्तान बेघरा की रानी रुदाबाई ने अपने सपनों का शिकार बनवाया, राणा जी के महल की ओर दस हजार से अधिक स्मारक लेकर पंहुचा, रानी रुदाबाई के पास शाह ने दूत के माध्यम से विध्वंस प्रस्ताव, रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर बनी छावनी की स्थापना की थी धनुर्धारी वीरांगनाये थी, जो रानी रुदा सौबाई के संकेत स्थल पे ही आश्रम का संरक्षण करने के लिए तत्पर थी...


रानी रुदाबाई न केवल सौंदर्य की धनी थीं, बल्कि शौर्य और बुद्धि की भी धनी थीं, उन्होंने सुल्तान बेघारा को महल के दरवाजे के स्थान पर आने के लिए कहा, सुल्तान बेघारा रानी को लाल अंधेरी दृष्टि में वही रूप मिला जैसा रुदाबाई ने कहा था, और रुदाबाई ने समय न गंवाते हुए सुल्तान बेघारा की छाती में खंजर उतार दिया और किनारों पर तीरों की वर्षा होती रही, जिससे शाह का स्मारक बचकर वापस नहीं जा पाया...


रानी रूदा बाई का क्रोध इतने पे शांत नहीं हुआ, उन्होंने सुल्तान के शरीर से उनके शीश पाटन की सीमा पर फाँसी दी और सुल्तान के वक्ष को चीर कर उनके विचारों से सराबोर हृदय कर्णावती नगर के मध्य फाँक कर यह चेतावनी दी यदि कोई विधर्मी भारतीय सीमा या हिंदू नारी की ओर कुदृष्टि संपादक का विचार भी मन में लाता है तो किस दुर्गति को प्राप्त किया जाएगा...



इस युद्ध के बाद रानी रुदाबाई ने जल समाधि ले ली ताकि उन्हें कोई और आक्रमणकारी अपवित्र न कर सके।


जिनकी ललकार से म्रत्यु भी भयाक्रांत हो गई थी - जवाहर बाई राठौड़..

  जवाहर बाई राठौड़.. जिनकी ललकार से म्रत्यु भी भयाक्रांत हो गई थी इतिहास गवाह है कई बार कायर को सिंहनी ब्याही गई पर समय आने पर वही सिंहनी रणच...